
प्रातरुत्थाय कर्तव्यं, देवतागुरुदर्शनम् ।
भक्त्या तद्वन्दना कार्या, धर्मश्रुतिरुपासकै: ॥16॥
पश्चादन्यानि कार्याणि, कर्तव्यानि यतो बुधै: ।
धर्मार्थकाममोक्षाणामादौ धर्मः प्रकीर्तितः ॥17॥
आराधकों को प्रात उठ, जिनदेव-गुरु-दर्शन सदा ।
भक्तिपूर्वक वन्दना अरु, धर्म सुनना चाहिए॥
फिर अन्य सब गृहकार्य करना, क्योंकि ज्ञानीजन कहें ।
धर्मार्थ काम रु मोक्ष, इनमें धर्म ही पहले करें॥
अन्वयार्थ : भव्य जीवों को प्रातःकाल उठ कर, जिनेन्द्र देव तथा गुरु का दर्शन करना चाहिए, भक्तिपूर्वक उनकी वन्दना-स्तुति भी करनी चाहिए और धर्म का श्रवण भी करना चाहिए । इसके बाद ही अन्य गृह आदि सम्बन्धी कार्य करने योग्य हैं क्योंकि गणधर आदि महापुरुषों ने धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष - इन चार पुरुषार्थों में धर्म का ही सबसे प्रथम निरूपण किया है तथा उसी को मुख्य माना है ।