+ ज्ञान-प्राप्ति हेतु निर्ग्रन्थ गुरुओं की सेवा आवश्यक -
गुरोरेव प्रसादेन, लभ्यते ज्ञानलोचनम् ।
समस्तं दृश्यते येन, हस्तरेखेव निस्तुषम् ॥18॥
ज्ञान-लोचन प्राप्त होते, गुरुजनों की कृपा से ।
हस्तरेखावत् समस्त, पदार्थ जिससे प्रगट हैं॥
अन्वयार्थ : जिस केवलज्ञानरूपी लोचन से समस्त पदार्थ, हाथ की रेखा के समान प्रगट रीति से देखने में आते हैं - ऐसा ज्ञानरूपी नेत्र, निर्ग्रन्थ गुरुओं की कृपा से ही प्राप्त होता है; अत: ज्ञान के आकांक्षी मनुष्यों को भक्तिपूर्वक गुरुओं की सेवा-वन्दना करना चाहिए ।