+ शास्त्राभ्यास के बिना नेत्रधारी भी अन्धे के समान -
ये पठन्ति न सच्छास्त्रं, सद्गुरुप्रकटीकृतम् ।
तेऽन्धाःसचक्षुषोऽपीह, सम्भाव्यन्ते मनीषिभिः ॥20॥
निर्ग्रन्थ गुरुओं से रचित, सत्-शास्त्र जो पढ़ते नहीं ।
नेत्र होते हुए भी, अन्धे उन्हें ज्ञानी कहें॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, उत्तम और निष्कलंक गुरुओं से प्रगट किये हुए शास्त्रों को नहीं पढ़ते हैं; उन मनुष्यों को विद्वान् पुरुष, नेत्रधारी होने पर भी अन्धे ही मानते हैं ।