
मन्ये न प्रायशस्तेषां, कर्णाश्च हृदयानि च ।
यैरभ्यासे गुरोः शास्त्रं, न श्रुतं नाऽवधारितम् ॥21॥
सुनें नहिं जो शास्त्र गुरु से, हृदय में नहिं धारते ।
उनके नहीं हैं कान मन भी नहीं - यह ज्ञानी कहें॥
अन्वयार्थ : जिन मनुष्यों ने गुरु के पास में रह कर, न तो शास्त्र को सुना है और न हृदय में धारण किया है, उनके कान तथा मन नहीं है - ऐसा हम प्रायः मानते हैं ।