+ सम्यग्दृष्टि पुरुष का आश्रय-स्थान -
तं देशं तं नरं तत्स्वं, तत्कर्माण्यपि नाश्रयेत् ।
मलिनं दर्शनं येन, येन च व्रतखण्डनम् ॥26॥
उस देश-नर-धन या क्रिया का आश्रय ज्ञानी तजें ।
जहाँ दर्शन मलिन हो अथवा व्रतों में भंग हो॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दृष्टि श्रावक, ऐसे देश, ऐसे पुरुष, ऐसे धन तथा ऐसी क्रिया का कदापि आश्रय नहीं करते; जहाँ पर उनका सम्यग्दर्शन मलिन हो तथा व्रतों में दोष लगे ।