+ रत्नत्रय का आश्रय ही श्रेयस्कर -
रत्नत्रयाश्रयः कार्य:, तथा भव्यैरतन्द्रितैः ।
जन्मान्तरेऽपि यच्छ्रद्धा, यथा संवर्धते तराम् ॥28॥
आलस्य रहित हो भव्यजन, धारण करो त्रय-रत्न को ।
ताकि जन्मान्तरों में भी, धर्म पर श्रद्धा बढ़े॥
अन्वयार्थ : आलस्य रहित होकर भव्य जीवों को उसी रीति से रत्नत्रय का आश्रय करना चाहिए, जिससे अन्य जन्मों में भी उनकी श्रद्धा बढ़ती जाए ।