
विनयश्च यथायोग्यं, कर्तव्यः परमेष्ठिषु ।
दृष्टि-बोध-चारित्रेषु, तद्वत्सु समयाश्रितैः ॥29॥
रत्नत्रय, धर्मात्मा, परमेष्ठियों की विनय भी ।
कर्त्तव्य ज्ञानी यथासम्भव, जिनागम पाठी अहो !
अन्वयार्थ : जो जिनेन्द्र-सिद्धान्त के अनुयायी हैं, उन भव्य जीवों को योग्यतानुसार उत्कृष्ट स्थान में रहने वाले परमेष्ठियों तथा सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र और इनके धारण करने वाले महात्माओं के प्रति विनय अवश्य करना चाहिए ।