+ दान बिना घर, केवल बाँधने के लिए जाल के समान -
दानं ये न प्रयच्छन्ति, निर्ग्रन्थेषु चतुर्विधम् ।
पाशा एव गृहास्तेषां, बन्धनायैव निर्मिता: ॥32॥
निर्ग्रन्थ-यति को जो चतुर्विध, दान देते हैं नहीं ।
उनके लिए घर जालवत् है, बाँधने के लिए ही॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष, निर्ग्रन्थ यतीश्वरों को आहार, औषधि, अभय तथा शास्त्र - इन चार प्रकार के दान को नहीं देते हैं, उन्होंने अपने घर, जाल के समान केवल बाँधने के लिए ही बनाये हैं - ऐसा मालूम होता है ।