+ उत्तम दान की महिमा -
अभयाहारभैषज्य, -शास्त्रदाने हि यत्कृते ।
ऋषीणां जायते सौख्यं, गृही श्लाघ्य: कथं न स: ॥33॥
आहार-औषधि-अभय-ज्ञान, सुदान जो देते गृही ।
क्यों न होवें श्लाघ्य वे, जब ऋषी भी होते सुखी॥
अन्वयार्थ : जिस गृहस्थ के द्वारा अभयदान, आहारदान, औषधिदान और शास्त्रदान के करने पर यतीश्वरों को अत्यन्त सुख होता है; वह गृहस्थ प्रशंसा के योग्य क्यों नहीं है? अर्थात् उस गृहस्थ की सर्व लोक प्रशंसा करता है; इसलिए ऐसा उत्तम दान, गृहस्थों को अवश्य देना चाहिए ।