+ दान से ही स्वर्ग-सुख की प्राप्ति -
समर्थाेऽपि न यो दद्यात्, यतीनां दानमादरात् ।
छिनत्ति स स्वयं मूढः, परत्र सुखमात्मनः ॥34॥
सामर्थ्य है पर नहीं देते, दान जो आदर सहित ।
वे मूढ़ परभव के सुखों का, नाश करते स्वयं ही॥
अन्वयार्थ : समर्थ होकर भी जो पुरुष, आदरपूर्वक यतीश्वरों को दान नहीं देते; वह मूढ़ पुरुष आगामी जन्म में होने वाले अपने सुख का स्वयं नाश करते हैं ।