+ दान से रहित गृहस्थाश्रम, पत्थर की नौका के समान -
दृषन्नावसमो ज्ञेयो, दानहीनो गृहाश्रमः ।
तदारूढो भवाम्भोधौ, मज्जत्येव न संशय: ॥35॥
दान बिन यह गृहस्थाश्रम, पाषाण-नौकावत् कही ।
बैठ उस पर भवोदधि में, डूबते संशय नहीं॥
अन्वयार्थ : जो गृहस्थाश्रम, दान से रहित है, वह पत्थर की नाव के समान है - ऐसे गृहस्थाश्रमरूपी पत्थर की नाव पर बैठने वाला मनुष्य, नियम से संसाररूपी समुद्र में डूबता है ।