
समयस्थेषु वात्सल्यं, स्वशक्त्या ये न कुर्वते ।
बहुपापावृतात्मान:, ते धर्मस्य पराङमुखा: ॥36॥
धर्मात्मा में शक्ति के अनुसार नहिं प्रीति करें ।
बहु पाप से हैं वे ढके, अरु विमुख हैं वे धर्म से॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, साधर्मी सज्जनों में शक्ति के अनुसार प्रीति नहीं करते, उन मनुष्यों की आत्मा प्रबल पाप से ढकी हुई है और वे धर्म से पराङ्मुख हैं अर्थात् धर्म के अभिलाषी नहीं हैं; इसलिए भव्य जीवों को साधर्मी मनुष्यों के साथ अवश्य प्रीति करनी चाहिए ।