
येषां जिनोपदेशेन, कारुण्याऽमृतपूरिते ।
चित्ते जीवदया नास्ति, तेषां धर्मः कुतो भवेत् ॥37॥
जिन-वचन से कारुण्य अमृत से भरे जिस हृदय में ।
प्राणी-दया यदि है नहीं तो धर्म कैसे हो उन्हें॥
अन्वयार्थ : जिनेन्द्र भगवान के उपदेश के प्रभाव से जिन मनुष्यों के करुणारूपी अमृत से पूरित चित्तों में दया नहीं है, उन मनुष्यों को धर्म कदापि नहीं हो सकता ।