
मूलं धर्मतरोराद्या, व्रतानां धाम सम्पदाम् ।
गुणानां निधिरित्यंगि,-दया कार्या विवेकिभिः ॥38॥
धर्म-तरु का मूल, व्रत में मुख्य, सम्पति-धाम जो ।
गुण-निधि यह दया है, कर्त्तव्य ज्ञानीजनों को॥
अन्वयार्थ : धर्मरूपी वृक्ष की जड़, समस्त व्रतों में मुख्य, सर्व सम्पदाओं का स्थान तथा गुणों का खजाना यह 'दया' है, अत: विवेकी मनुष्यों को दया अवश्य करनी चाहिए ।