+ सर्वज्ञदेव द्वारा कथित सभी व्रत, अहिंसा के साधन -
यतीनां श्रावकाणां च, व्रतानि सकलान्यपि ।
एकाऽहिंसाप्रसिद्धयर्थं, कथितानि जिनेश्वरैः ॥40॥
यति एवं श्रावकों के, व्रत सभी जो हैं कहे ।
सब अहिंसा की प्रसिद्धि, के लिए जिनवर कहें॥
अन्वयार्थ : जितने मुनियों तथा श्रावकों के व्रत सर्वज्ञदेव ने कहे हैं, वे सर्व अहिंसा की प्रसिद्धि के लिए ही कहे हैं, उनमें कोई भी व्रत, हिंसा का पोषण करने वाला नहीं कहा गया है; इसलिए व्रती मनुष्य को समस्त प्राणियों पर दया अवश्य ही रखनी चाहिए ।