
जीवहिंसादिसंकल्पै,-रात्मन्यपि हि दूषिते ।
पापं भवति जीवस्य, न परं परपीडनात् ॥41॥
हिंसादि के संकल्प से मन में मलिनता हो यदि ।
तो पाप हो निश्चित अरे, नहिं मात्र परवध से कभी॥
अन्वयार्थ : केवल अन्य प्राणियों को पीड़ा देने से ही पाप की उत्पत्ति नहीं होती; बल्कि 'उस जीव को मारूँगा' अथवा 'वह जीव मर जाए तो अच्छा हो', इत्यादि जीव-हिंसा के संकल्पों से भी जब आत्मा मलिन होता है, तब भी पाप की उत्पत्ति होती है; इसलिए उत्तम मनुष्यों को जीव-हिंसा का संकल्प भी नहीं करना चाहिए ।