+ बारह भावनाओं के चिन्तवन से ही कर्मों का नाश -
द्वादशाऽपि सदा चिन्त्या, अनुप्रेक्षा महात्मभि: ।
तद्भावना भवत्येव, कर्मणः क्षयकारणम् ॥42॥
भावना बारह सदा, चिन्तन करें उत्तम पुरुष ।
क्योंकि उनका चिन्तवन ही, कर्मक्षय कारण कहा॥
अन्वयार्थ : उत्तम पुरुषों को बारह भावनाओं का चिन्तवन सदा करना चाहिए क्योंकि इन भावनाओं का चिन्तवन समस्त कर्मों का नाश करने वाला है ।