
अध्रुवाऽशरणे चैव, भव एकत्वमेव च ।
अन्यत्वमशुचित्वं च, तथैवाऽस्रवसंवरौ ॥
निर्जरा च तथा लोको, बोधिदुर्लभधर्मता ।
द्वादशैताऽनुप्रेक्षा, भाषिता जिनपुङ्गवै: ॥44॥
अध्रुव अशरण भावना, संसार अरु एकत्व है ।
अन्यत्व अरु अशुचित्व, आस्रव भावना संवर कहें॥
निर्जरा अरु लोक एवं, बोधिदुर्लभ धर्म भी ।
ये भावना बारह अहो! सर्वज्ञदेवों ने कहीं॥
अन्वयार्थ : अध्रुव, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचित्व, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्म - ये बारह अनुप्रेक्षाएँ जिनेन्द्र देव ने कही हैं ।