
अध्रुवाणि समस्तानि, शरीरादीनि देहिनाम् ।
तन्नाशेऽपि न कर्तव्यः, शोको दुष्कर्मकारणम् ॥45॥
प्राणियों की देह आदि, सभी हैं अध्रुव अरे !
नष्ट हों तो शोक नहिं करना, बँधें दुष्कर्म रे !
अन्वयार्थ : प्राणियों के समस्त शरीर, धन, धान्य आदि पदार्थ विनाशीक हैं; इसलिए उनके नष्ट होने पर जीवों को कुछ भी शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि उस शोक से केवल खोटे कर्मों का ही बन्ध होता है ।