+ एकत्व भावना -
स्वजनो वा परो वाऽपि, नो कश्चित्परमार्थतः ।
केवलं स्वार्जितं कर्म, जीवेनैकेन भुज्यते ॥48॥
परमार्थ से जग में न कोई, स्वजन है या अन्यजन ।
प्राणी अकेला भोगता, अपने उपार्जित कर्मफल॥
अन्वयार्थ : यदि निश्चय से देखा जाए तो संसार में जीव का न तो कोई स्वजन है और न कोई परजन ही है क्योंकि जीव अपने किये हुए कर्म के फल को अकेला ही भोगता है ।