+ अन्यत्व भावना -
क्षीरनीरवदेकत्र, स्थितयोर्देहदेहिनोः ।
भेदो यदि ततोऽन्येषु, कलत्रादिषु का कथा ॥49॥
दूध-जलवत् आत्मा अरु, देह दोनों हैं मिले ।
भिन्न ये दोनों कहो! पुत्रादि की फिर क्या कथा ?
अन्वयार्थ : शरीर और आत्मा की स्थिति, दूध तथा जल के समान मिली हुई है । यदि ये दोनों भी परस्पर में भिन्न हैं तो सर्वथा भिन्न स्त्री-पुत्र आदि तो अवश्य ही भिन्न हैं; इसलिए विद्वानों को शरीर, स्त्री, पुत्र आदि को अपना कदापि नहीं मानना चाहिए ।