
तथाऽशुचिरयं कायः; कृमिधातुमलान्वित: ।
यथा तस्यैव सम्पर्कादन्यत्राऽप्यपवित्रता ॥50॥
कृमि-धातु-मल-मूत्रादिमय, यह देह इतनी मलिन है ।
कि अन्य भी सब वस्तु इसके, संग से भी मलिन हैं॥
अन्वयार्थ : कीड़े, धातु, मल, मूत्र आदि अपवित्र पदार्थों से भरा हुआ यह शरीर इतना अपवित्र है कि उसके सम्बन्ध से दूसरी वस्तु भी अपवित्र हो जाती है ।