
जीव-पोतो भवाम्भोधौ, मिथ्यात्वादिक-रन्ध्रवान् ।
आस्रवति विनाशार्थं, कर्माम्भ: प्रचुरं भ्रमात् ॥51॥
भव-उदधि में जीव-नौका, मिथ्यात्वादिक छिद्र हैं ।
कर्म-जल से भरे नौका, जग में डुबाने के लिए॥
अन्वयार्थ : इस संसाररूपी समुद्र में जिस समय यह जीवरूपी जहाज, मिथ्यात्व-अविरति-प्रमाद-कषाय-योगरूप छिद्रों से सहित होता है; उस समय वह अपने विनाश के लिए अज्ञानता से प्रचुर कर्मरूपी जल को आस्रवरूप करता है ।