+ संवर भावना -
कर्मास्रवनिरोधोऽत्र, संवरो भवति ध्रुवम् ।
साक्षादेतदनुष्ठानं, मनोवाक्कायसंवृत्ति: ॥52॥
कर्मागमन को रोकना ही, नियम से संवर कहा ।
काय-मन-वच संवरण है, यही संवर की क्रिया॥
अन्वयार्थ : आते हुए कर्मों का रुक जाना ही निश्चय से संवर है तथा मन-वचन-काय का जो संवरण (स्वाधीन) करना है, वही संवर का आचरण है ।