
निर्जरा शातनं प्रोक्ता, पूर्वोपार्जितकर्मणाम् ।
तपोभिर्बहुभिः सा स्यात्, वैराग्याश्रितचेष्टितैः ॥53॥
पूर्व-संचित कर्म आंशिक, खिरें यह है निर्जरा ।
बहुभाँति तप वैराग्य आश्रित, क्रिया से ही निर्जरा॥
अन्वयार्थ : पहले से संचित हुए कर्मों का एकदेशरूप से नाश होना, निर्जरा है । वह निर्जरा, संसार-देह आदि से वैराग्य कराने वाले अनशन-अवमौदर्य आदि तप से होती है ।