+ धर्म भावना -
निजधर्मोऽयमत्यन्तं, दुर्लभो भविनां मतः ।
तथा ग्राह्यो यथा साक्षादामोक्षं सह गच्छति ॥56॥
निजधर्म की प्राप्ति जगत्जन, को अति दुर्लभ अरे !
इस रीति से यह धर्म धारो, मोक्ष तक यह संग रहे॥
अन्वयार्थ : संसार में प्राणियों को ज्ञानानन्दस्वरूप निजधर्म का पाना अत्यन्त कठिन है, इसलिए यह धर्म ऐसी रीति से ग्रहण करना चाहिए कि मोक्ष पर्यंत इसका साथ बना रहे ।