+ संसार से तिरने हेतु धर्मरूपी जहाज का आश्रय आवश्यक -
दुःखग्राहगणाऽऽकीर्णे, संसारक्षारसागरे ।
धर्मपोतं परं प्राहु:, तारणार्थं मनीषिणः ॥57॥
संसार-खार-समुद्र में, दु:खरूप जलचर हैं भरे ।
पार करने के लिए है, धर्म-नौका बुध कहें॥
अन्वयार्थ : नाना प्रकार के दुःखरूपी नक्र-मकर से व्याप्त इस संसाररूपी खारे समुद्र से पार करने वाला धर्म, जहाज के समान है - ऐसा गणधर आदि महापुरुष कहते हैं, इसलिए संसार से तिरने की इच्छा करने वाले जीवों को इस धर्मरूपी जहाज का आश्रय लेना चाहिए ।