
अनुप्रेक्षा इमाः सद्भि:, सर्वदा हृदये धृताः ।
कुर्वते तत्परं पुण्यं, हेतुर्यत्स्वर्गोक्षयोः ॥58॥
इन भावनाओं को सदा, सज्जन पुरुष जो उर धरें ।
वे स्वर्ग एवं मोक्ष-सुख के, हेतु पुण्यार्जन करें॥
अन्वयार्थ : जो सज्जन पुरुष, बारम्बार इन बारह भावनाओं का चिन्तवन करते हैं, वे स्वर्ग तथा मोक्ष के कारणभूत पुण्य का उपार्जन करते हैं, इसलिए स्वर्ग-मोक्ष के कारणस्वरूप पुण्य को चाहने वाले भव्य जीवों को इन बारह भावनाओं का चिन्तवन सदैव करना चाहिए ।