+ ज्ञानी को आत्मा ही चिन्तवन करने योग्य -
कर्मभ्यः कर्मकार्येभ्यः, पृथग्भूतं चिदात्मकम् ।
आत्मानं भावयेन्नित्यं, नित्यानन्दपदप्रदम् ॥61॥
कर्म एवं कर्मफल से, भिन्न चेतनरूप जो ।
नित्य आनन्दप्रद निजात्मा, का सदा अनुभव करो॥
अन्वयार्थ : कर्म तथा कर्म के कार्यों से सर्वथा भिन्न, चिदानन्द चैतन्यस्वरूप, अविनाशी और आनन्दस्वरूप स्थान को देने वाले आत्मा का ज्ञानी को सदा चिन्तवन करना चाहिए ।