
सम्प्राप्तेऽत्र भवे कथं कथमपि, द्राघीयसाऽनेहसा;
मानुष्ये शुचिदर्शने च महता, कार्यं तपो मोक्षदम् ।
ना े चल्े लाके निषधे तोऽथ महतो, मोहादशक्तेरथो;
सम्पद्येत न तत्तदा गृहवतां, षट्कर्मयोग्यं व्रतम् ॥4॥
दीर्घकाल में महाकष्ट से, उत्तम नरभव प्राप्त किया ।
शुचि-दर्शन पा, महापुरुष को, मोक्षद तप कर्त्तव्य कहा॥
लोक-निषेध या मोहोदय, से यदि तप में नहीं समर्थ ।
तो गृहस्थ के षट् कर्मों के, योग्य करें आवश्यक व्रत॥
अन्वयार्थ : अनन्त काल के बीत जाने पर, इस संसार में बड़ी कठिनता से प्राप्त होने वाले मनुष्य जन्म के मिलने पर तथा सम्यग्दर्शन के प्राप्त होने पर, उत्तम पुरुषों के द्वारा मोक्ष को देने वाला तप अवश्य करना चाहिए । यदि मनुष्यों के निषेध करने से अथवा प्रबल चारित्रमोहनीय कर्म के उदय से अथवा असमर्थपने से तप न हो सके तो गृहस्थों के देव-पूजा, गुरु-सेवा, स्वाध्याय आदि षट्कर्मों के योग्य व्रत तो अवश्य ही करना चाहिए ।