
दृङ्मूलव्रतमष्टधा तदनु च, स्यात्पञ्चधाऽणुव्रतं;
शीलाख्यं च गुणव्रतं त्रयमत:, शिक्षाश्चतस्र: परा: ।
रात्रौ भोजनवर्जनं शुचिपटात्, पेयं पय: शक्तितो;
मौनादिव्रतमप्यनुष्ठितमिदं, पुण्याय भव्यात्मनाम् ॥5॥
आठ मूलगुण पाँच अणुव्रत, सम्यग्दर्शन सहित धरें ।
गुणव्रत तीन, चार शिक्षाव्रत, यही शीलव्रत सात धरें॥
निशिभोजन परित्याग वस्त्र से, छने नीर का पान करें ।
शक्त्यनुसार मौनव्रत धारें, तो भव्यों को पुण्य बँधे॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दर्शनपूर्वक आठ मूलगुणों का पालन करना, अहिंसादि पाँच अणुव्रतों को धारण करना, दिग्व्रतादि तीन गुणव्रत तथा देशावकाशिक आदि चार शिक्षाव्रत - इन सात शीलव्रतों का पालन करना, रात में खाद्य-स्वाद्य आदि चतुर्विध आहार का त्याग करना, स्वच्छ कपड़े से छने हुए जल का पीना, शक्ति के अनुकूल मौन आदि व्रतों का धारण करना; इस प्रकार ये श्रावकों के व्रत हैं, इनका भलीभाँति आचरण करने वाले श्रावक पुण्य के भागी होते हैं; इसलिए धर्मात्मा श्रावकों को इन व्रतों का अवश्य ही पालन करना चाहिए ।