+ व्रती श्रावक के बारह व्रतों का विधान -
हन्ति स्थावरदेहिन: स्वविषये, सर्वांस्त्रसान् रक्षति;
बू्रते सत्यमचौर्यवृत्तिमबलां, शुद्धां निजां सेवते ।
दिग्देशव्रतदण्ड-वर्जनमत:, सामायिकं प्रोषधं;
दानं भोगयुगप्रमाणमुररी,-कुर्याद् गृहीति व्रती ॥6॥
स्व-प्रयोजन से एकेन्द्रिय-वध, सर्व त्रसों पर दया करे ।
सत्य कहे चोरी न करे, निज-वनिता का ही भोग करे॥
दिग्-देश-अनर्थदण्ड व्रत, सामायिक-प्रोषध धारे ।
दान करे भोगोपभोग-परिमाण गृहस्थ-व्रती धारे॥
अन्वयार्थ : व्रती श्रावक, यद्यपि अपने प्रयोजन के लिए स्थावर काय के जीवों को मारता है; तथापि (अणुव्रत -) दो इन्द्रिय आदि से सैनी पंचेन्द्रिय पर्यन्त समस्त त्रस जीवों की रक्षा करता है, सत्य बोलता है, अचौर्यव्रत का पालन करता है, स्व-स्त्री का सेवन करता है, परिग्रह का परिमाण करता है । (गुणव्रत -) दिग्व्रत, देशव्रत एवं अनर्थदण्डव्रत का पालन करता है; (शिक्षाव्रत -) सामायिक, प्रोषधोपवास, दान (अतिथि संविभाग) तथा भोगोपभोगपरिमाण नामक व्रत को स्वीकार करता है ।