
देवाऽऽराधन- पूजनादि-बहुषु, व्यापार-कार्येषु सत्;
पुण्योपार्जन-हेतुषु प्रतिदिनं, संजायमानेष्वपि ।
संसाराऽर्णवतारणे प्रवहणं, सत्पात्रमुद्दिश्य यत्;
तद्देशव्रतधारिणो धनवतो, दानं प्रकृष्टो गुण: ॥7॥
पुण्योपार्जन कारक जिन-पूजन, अरु अर्चनादि बहु कार्य ।
धर्मात्मा धनवान् श्रावकों, के घर प्रतिदिन ये सत्कार्य॥
किन्तु दान सत्पात्रों को है, भव-समुद्र से तारक पोत ।
अत: देशव्रतधारी धनिकों, का है यह अति उत्तम स्रोत॥
अन्वयार्थ : यद्यपि धनवान और धर्मात्मा श्रावकों के दैनिक जीवन में श्रेष्ठ पुण्यसंचय करने वाले जिनेन्द्र देव की सेवा तथा पूजन-प्रतिष्ठा आदि अनेक उत्तम कार्य प्रतिदिन होते रहते हैं; तथापि उन सब उत्तम कार्यों में संसार-समुद्र से पार करने में जहाज के समान, श्रेष्ठ मुनि आदि पात्रों को दान देना, धर्मात्मा श्रावकों का सबसे प्रधान गुण है; इसलिए भव्य श्रावकों को सदा उत्तम पात्रों को दान देना चाहिए ।