
सर्वो वाञ्छति सौख्यमेव तनुभृत्, तन्मोक्ष एव स्फुटं;
दृष्ट्यादित्रय एव सिध्यति स तत्, निर्ग्रन्थ एव स्थितम् ।
तद्वृत्तिर्वपुषोऽस्य वृत्तिरशनात्, तद्दीयते श्रावकै:;
काले क्लिष्टतरेऽपि मोक्षपदवी, प्रायस्ततो वर्तते ॥8॥
सभी जीव नित सुख चाहें, पर सुख शिवपुर में यह स्पष्ट ।
शिवपुर रत्नत्रय से मिलता, जिसे धारते हैं निर्ग्रन्थ॥
वह तो देहाश्रित अरु देह, टिके जो श्रावक दें आहार ।
क्लिष्ट काल में शिवपथवृत्ति, कही गृहस्थों के आधार॥
अन्वयार्थ : समस्त जीव, सदैव सुख की अभिलाषा करते हैं; परन्तु यदि अनुभव किया जाए तो वास्तविक सुख, मोक्ष में ही है । उस मोक्ष की प्राप्ति, सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञानसम् यक्चारित्र स्वरूप रत्नत्रय के धारण करने से ही होती है । रत्नत्रय की प्राप्ति, निर्ग्रन्थ अवस्था में ही होती है । निर्ग्रन्थ अवस्था, शरीर के होने पर ही होती है । शरीर की स्थिति, अन्न से रहती है और वह अन्न, धर्मात्मा श्रावकों के द्वारा दिया जाता है, इसलिए इस दु:खम काल में मोक्ष-पदवी की प्रवृत्ति, गृहस्थों के द्वारा दिये हुए आहारदान से ही होती है - ऐसा जान कर, धर्मात्मा श्रावकों को सदा सत्पात्रों को दान देना चाहिए ।