
स्वेच्छाऽऽहार-विहार-जल्पनतया, नीरुग्वपुर्जायते;
साधूनां तु न सा ततस्तदपटु, प्रायेण सम्भाव्यते ।
कुर्यादौषध-पथ्य-वारिभिरिदं, चारित्र-भार-क्षमं;
यत्तस्मादिह वर्तते प्रशमिनां, धर्मो गृहस्थोत्तमात् ॥9॥
स्वेच्छाहार-विहार-वचन से, रोगरहित रहती है देह ।
किन्तु साधु नहिं स्वेच्छाचारी, अत: न सक्षम उनकी देह॥
औषधि पथ्य सुनिर्मल जल से, देह धरे चारित का भार ।
इसीलिए उत्तम श्रावक से, हो मुनि-धर्म-प्रवृत्ति महान्॥
अन्वयार्थ : सामान्यतया इच्छानुसार भोजन, भ्रमण तथा भाषण से शरीर रोगरहित रहता है, परन्तु मुनियों के लिए न तो इच्छानुसार भोजन करने की ही आज्ञा है और न इच्छानुसार भ्रमण तथा भाषण की ही आज्ञा है; इसलिए उनका शरीर सदा अशक्त ही बना रहता है । धर्मात्मा श्रावक उत्तम दवा, पथ्य और निर्मल जल देकर मुनियों के शरीर को चारित्र-पालन के लिए समर्थ बनाते हैं, इसलिए मुनिधर्म की प्रवृत्ति भी उत्तम श्रावकों से ही होती है; अत: आत्मा के हित की अभिलाषा करने वाले भव्य जीवों को अवश्य ही मुनिधर्म की प्रवृत्ति के प्रधान कारण, इस गृहस्थधर्म को धारण करना चाहिए ।