+ ज्ञानदान के द्वारा थोड़े ही भवों में केवलज्ञान की प्राप्ति -
व्याख्या पुस्तकदानमुन्नतधियां, पाठाय भव्यात्मनां;
भक्त्या यत्क्रियते श्रुताश्रयमिदं, दानं तदाहुर्बुधा: ।
सिध्देऽस्मिन् जननान्तरेषु कतिषु, त्रैलोक्यलोकोत्सव-;
श्रीकारिप्रकटीकृताऽखिलजगत्, कैवल्यभाजो जना: ॥10॥
बुद्धिमान भव्यों को पुस्तक, देना एवं श्रुत-व्याख्यान॥
भक्तिपूर्वक करना पण्डित, कहते इसको ज्ञानप्रदान॥
इसके होने पर भविजन, कुछ भव में पाते केवलज्ञान ।
जिसमें उत्सव हो त्रिभुवन में, जगत् प्रकाशित सूर्य समान॥
अन्वयार्थ : सर्वज्ञदेव द्वारा कहे हुए शास्त्र का भक्तिपूर्वक जो व्याख्यान किया जाता है तथा विशाल बुद्धिवाले भव्य जीवों को पढ़ने के लिए जो पुस्तकें दी जाती हैं; उसको ज्ञानी पुरुष शास्त्रदान (ज्ञानदान) कहते हैं । भव्यों को इस ज्ञानदान की प्राप्ति होने पर थोड़े ही भवों में, तीन लोक के जीवों को उत्सव तथा लक्ष्मी के करने वाले और समस्त लोक के पदार्थों को हाथ की रेखा के समान देखने वाले केवलज्ञान की उत्पत्ति होती है ।