
सर्वेषामभयं प्रवृद्ध-करुणै:, यद्दीयते प्राणिनां;
दानं स्यादभयादि तेन रहितं, दानत्रयं निष्फलम् ।
आहारौषधशास्त्रदानविधिभि:, क्षुद्रोगजाड्याद्भयं;
यत्तत्पात्रजने विनश्यति ततो, दानं तदेकं परम् ॥11॥
अति करुणावन्तों द्वारा जो, प्राणी-रक्षा की जाती ।
अभयदान है यही, बिना इसके निष्फल हैं दान सभी॥
आहारौषध-शास्त्र-दान से क्षुधा-रोग अरु जड़ता का ।
भय होता है नष्ट अत:, यह अभयदान उत्कृष्ट कहा॥
अन्वयार्थ : विस्तीर्ण करुणा के धारी भव्य जीवों द्वारा समस्त प्राणियों के भय को छुड़ा कर उनकी जो रक्षा की जाती है, उसको ज्ञानीजन अभयदान कहते हैं । इस अभयदान के बिना बाकी के तीन दान सर्वथा निष्फल हैं । आहार, औषध और शास्त्र - इन तीन दान को देने से क्षुधा के भय का, रोग के भय का और मूर्खता के भय का ही नाश होता है; इसलिए एक अभयदान ही समस्त दानों में उत्कृष्ट दान है ।