
आहारात् सुखितौषधादतितरां, नीरोगता जायते;
शास्त्रात् पात्रनिवेदितात् परभवे, पाण्डित्यमत्यद्भुतम् ।
एतत् सर्व-गुण-प्रभा-परिकर: पुंसोऽभयाद्दानत:;
पर्यन्ते पुनरुन्नतोन्नतपद, प्राप्तिर्विमुक्तिस्तत: ॥12॥
अशनदान से लौकिक सुख, औषधि देने से तन नीरोग ।
शास्त्रदान दें तो परभव में, हो अद्भुत पाण्डित्य अहो !
अभयदान से उपर्युक्त, सारे गुण होते अपने आप ।
उत्तम से उत्तम पद पाकर, हो जाता है शिवपद प्राप्त॥
अन्वयार्थ : उत्तमादि पात्रों को आहारदान देने से इन्द्र, धरणेन्द्र, चक्रवर्ती आदि पदों की प्राप्ति होती है; औषधदान देने से परभव में अत्यन्त रूपवान् तथा नीरोग शरीर मिलता है; शास्त्रदान देने से अत्यन्त विद्वता की प्राप्ति होती है तथा अभयदान देने से उपर्युक्त सुख एवं नीरोगपना आदि समस्त गुणों की प्राप्ति होती है । अन्त में उत्तमोत्तम चक्रवर्ती आदि पदों की प्राप्ति होकर मोक्ष मिलता है । इसलिए उत्तमोत्तम सुख, नीरोगता आदि गुणों के अभिलाषी मनुष्यों को अवश्य ही चारों प्रकार का दान देना चाहिए ।