+ धन को खर्च करने का मार्ग, दान से उत्कृष्ट और कोई नहीं -
कृत्वा कार्यशतानि पापबहुलानिऽऽश्रित्य खेदं परं;
भ्रान्त्वा वारिधिमेखलां वसुमतीं, दु:खेन यच्चाऽर्जितम् ।
तत्पुत्रादपि जीवितादपि धनं, प्रेयोऽस्य पन्था: शुभो;
दानं तेन च दीयतामिदमहो, नाऽन्येन तत्सद्गति: ॥13॥
शत-शत पाप-बहुल कार्यों से, और महा-दु:ख भी सह कर ।
सागर पर्वत या पृथ्वी पर, घूम-घूम कर धन-संचय॥
पुत्रों या प्राणों से भी प्रिय, धन-व्यय का सर्वोत्तम मार्ग ।
मात्र दान है, अन्य न धन की, सद्गति अत: करें बुध दान॥
अन्वयार्थ : सैंकड़ों पाप सहित कार्यों को करके, नाना प्रकार के दु:खों को उठा कर और समुद्र, पर्वत, पृथ्वी पर भ्रमण करके, बड़े कष्ट से जो धन का संचय किया जाता है; वह धन, पुत्र और अपने जीवन से भी प्यारा होता है । उस धन को खर्च करने का मार्ग यही है कि वह दान के काम में लाया जाए क्योंकि इससे भिन्न उस धन को खर्च करने का कोई भी उत्तम मार्ग नहीं । इसलिए सज्जन पुरुषों को चाहिए कि वे दान-मार्ग में ही धन का व्यय करें, दान के अतिरिक्त मार्ग में उस धन का उपयोग कदापि न करें ।