+ दानरहित गृहस्थपना दोनों लोक का नाशक -
दानेनैव गृहस्थता गुणवती, लोकद्वयोद्योतिका;
सैव स्यान्ननु तद्विना धनवतो, लोकद्वयध्वंसकृत् ।
दुर्व्यापारशतेषु सत्सु गृहिण:, पापं यदुत्पद्यते;
तन्नाशाय शशांकशुभ्रयशसे, दानं न चान्यत्परम् ॥14॥
धनवानों का गृहस्थ-आश्रम, दान मात्र से होय सफल ।
दोनों लोक प्रकाशित होते, बिना दान के हों निष्फल॥
खोटे व्यापारों से पाप, गृहस्थों को जो हों उत्पन्न ।
पापनाश अरु शशिसम यश के, लिए दान है कोई न अन्य॥
अन्वयार्थ : धनी मनुष्यों का गृहस्थपना, दान से ही श्रेष्ठ कहलाता है । दान से ही वह दोनों लोकों का प्रकाश करने वाला होता है; किन्तु बिना दान के वह गृहस्थपना, दोनों लोकों का नाश करने वाला ही है क्योंकि गृहस्थों के द्वारा सैकड़ों खोटे व्यापार करने से सदा पाप की उत्पत्ति होती रहती है । उस पाप के नाश हेतु तथा चन्द्रमा के समान यश की प्राप्ति के लिए एक पात्रदान ही है, दूसरी कोई वस्तु नहीं । इसलिए अपने आत्महित को चाहने वाले भव्य जीव पात्रदान से गृहस्थपने को तथा धन को सफल करें ।