+ भोग-विलास में खर्च होने वाले धन की निकृष्टता -
पात्राणामुपयोगि यत्किल धनं, तद्धीमतां मन्यते;
येनाऽनन्तगुणं परत्र सुखदं, व्यावर्तते तत्पुन: ।
यद्भोगाय गतं पुनर्धनवत:, तन्नष्टमेव धु्रवं;
सर्वासामिति सम्पदां गृहवतां, दानं प्रधानं फलम् ॥15॥
जो धन पात्रों को उपयोगी, वही श्रेष्ठ बुधजन मानें ।
यहाँ अनन्त गुना फलता है, परभव में सुखमय जानें॥
जो धन भोगों में लगता है, वह तो नष्ट हुआ जानो ।
क्योंकि गृहस्थों की सम्पति का, एक मुख्य फल दान अहो !
अन्वयार्थ : जो धन, उत्तमादि पात्रों के उपयोग में आता है; उसी धन को विद्वान लोग, अच्छा धन समझते हैं । वह पात्र में दिया हुआ धन, परलोक में सुख देने वाला होता है और अनन्त गुना फलता है; किन्तु जिन धनवानों का धन, नाना प्रकार के भोग-विलासों में खर्च होता है, उन धनवानों का धन, सर्वथा नष्ट ही हो गया है - ऐसा समझना चाहिए क्योंकि गृहस्थों की सर्व सम्पदाओं का प्रधान फल, एक दान ही है ।