
ये मोक्षं प्रति नोद्यता: सुनृभवे, लब्धेऽपि दुर्बुद्धय:;
ते तिष्ठन्ति गृहे न दानमिह चेत्, तन्मोहपाशो दृढ़: ।
मत्वेदं गृहिणा यथर्द्धि विविधं, दानं सदा दीयतां;
तत्संसारसरित्पतिप्रतरणे, पोतायते निश्चितम् ॥17॥
दुर्लभ नरभव पाकर भी जो, करें न शिवपद हेतु प्रयत्न ।
घर में रह कर दान न देते, उनका मोहपाश अति दृढ़॥
यही जान कर गृही यथा पद, देवें विविध प्रकार सुदान ।
क्योंकि दान ही भवसागर से, पार उतरने को है यान॥
अन्वयार्थ : अत्यन्त दुर्लभ इस मनुष्य भव को पाकर भी जो मनुष्य, मोक्ष के लिए उद्यम नहीं करते हैं, घर में ही पड़े रहते हैं; वे मनुष्य मूढ़ बुद्धि हैं । जिस घर में दान नहीं दिया जाता, वह घर अत्यन्त कठिन मोह का जाल है - ऐसा भलीभाँति समझ कर, अपने धन के अनुसार भव्य जीवों को नाना प्रकार का दान करना चाहिए क्योंकि यह उत्तमादि पात्रों में दिया हुआ दान ही संसाररूपी समुद्र से पार करने में जहाज के समान है ।