
यैर्नित्यं न विलोक्यते जिनपति:, न स्मर्यते नाऽर्च्यते;
न स्तूयेत न दीयते मुनिजने, दानं च भक्त्या परम् ।
सामर्थ्ये सति तद्गृहाऽऽश्रमपदं, पाषाणनावा समं;
तत्रस्था भवसागरेऽतिविषमे, मज्जन्ति नश्यन्ति च ॥18॥
हैं समर्थ पर नहीं करें जो, जिन-दर्शन-पूजन-स्तवन ।
मुनिजन को नहिं दान करें जो, उर में धर कर भक्ति परम॥
उन समर्थ का गृह-आश्रम पद, है पत्थर की नाव समान ।
उसमें बैठ डूब भव-सागर, मिले कहीं न नाम-निशान॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, समर्थ होने पर निरन्तर न तो भगवान का दर्शन ही करते हैं, न उनका स्मरण करते हैं, न उनकी पूजा करते हैं, न उनका स्तवन करते हैं और न निर्ग्रन्थ मुनियों को भक्तिपूर्वक दान देते हैं; उन मनुष्यों का गृहस्थाश्रम, पत्थर की नाव के समान है । उस गृहस्थाश्रम में रहने वाले गृहस्थ, इस भयंकर संसाररूपी समुद्र में नियम से डूब कर नष्ट हो जाते हैं । इसलिए जो भव्य जीव, अपने जीवन और धर्म को पवित्र करना चाहते हैं; उनको जिनेन्द्रदेव की पूजा-स्तुति आदि कार्य तथा उत्तमादि पात्रों को दान अवश्य ही देना चाहिए ।