
चिन्तारत्न-सुरद्रु-कामसुरभि-स्पर्शाेपलाद्या भुवि;
ख्याता एव परोपकारकरणे, दृष्टा न ते केनचित् ।
तैरत्रोपकृतं न केषुचिदपि, प्रायो न सम्भाव्यते;
तत्कार्याणि पुन: सदैव विदधद्, दाता परं दृश्यते ॥19॥
कल्पवृक्ष चिन्तामणि-रत्न, कामधेनु इत्यादि पदार्थ ।
पर-उपकारी सुने किसी ने, किन्तु नहीं देखा प्रत्यक्ष॥
उनके द्वारा हुआ किसी का, हित यह प्राय: शक्य नहीं ।
लेकिन ये सब करे सुदाता, यह दिखता प्रत्यक्ष यहीं॥
अन्वयार्थ : चिन्तामणि रत्न, कल्पवृक्ष, कामधेनु, पारस पत्थर आदि पदार्थ, संसार में परोपकारी हैं - यह बात तो आज तक सुनी है; किन्तु किसी ने अभी तक इन्हें साक्षात् उपकार करते हुए देखा नहीं है । उन्होंने किसी का उपकार किया होगा - इस बात की सम्भावना भी नहीं है, परन्तु चिन्तामणि रत्न आदि के कार्य को करने वाला दाता अवश्य देखने में आता है । इसलिए चिन्तामणि रत्न, कल्पवृक्ष आदि उत्कृष्ट पदार्थ दाता ही हैं; अत: उनसे भिन्न चिन्तामणि आदि कोई पदार्थ नहीं है ।