
यत्र श्रावकलोक एष वसति, स्यात्तत्र चैत्यालयो;
यस्मिन्सोऽस्ति च तत्र सन्ति यतयो, धर्मश्च तैर्वर्तते ।
धर्मे सत्यऽघसंचयो विघटते, स्वर्गाऽपवर्गाऽऽश्रयं;
सौख्यं भावि नृणां ततो गुणवतां, स्यु: श्रावका: सम्मता: ॥20॥
जिस नगरी में श्रावक रहते, वहाँ जिनालय निश्चित हो ।
चैत्यालय में बसें यतीश्वर, जिनसे धर्म-प्रवर्तन हो॥
संचित पाप नष्ट होते हैं, स्वर्ग-मोक्ष जन्मान्तर में ।
प्राप्त धर्म से अत: गुणीजन, श्रावक का सन्मान करें॥
अन्वयार्थ : जिस नगर तथा देश में श्रावक लोग रहते हैं, वहाँ पर जिन-मन्दिर होता है । जहाँ पर जिन-मन्दिर होता है, वहाँ पर यतीश्वर निवास करते हैं । जहाँ पर यतीश्वरों का निवास होता है, वहाँ अनादि काल से संचय किये हुए प्राणियों के पापों का नाश होता है तथा भविष्य काल में स्वर्ग तथा मोक्ष के सुखों की प्राप्ति होती है । इसलिए गुणवान् मनुष्यों को धर्मात्मा श्रावकों का आदर अवश्य करना चाहिए ।