
काले दु:खमसंज्ञके जिनपते:, धर्मे गते क्षीणतां;
तुच्छे सामयिके जने बहुतरे, मिथ्याऽन्धकारे सति ।
चैत्ये चैत्यगृहे च भक्तिसहितो, य: सोऽपि नो दृश्यते;
यस्तत्कारयते यथाविधि पुन:, भव्य: स वन्द्य: सताम् ॥21॥
दु:खमा नामक कलिकाल में, जिनवर कथित धर्म है क्षीण ।
समभावी मुनिराज विरल हैं, अत: प्रबल है मोह-तिमिर॥
जिन-मन्दिर जिन-प्रतिमा के प्रति, भक्तिवंत नर नहीं दिखें ।
भव्य यथाविधि करें कार्य ये, सज्जन उनको नमन करें॥
अन्वयार्थ : इस दु:खमा नामक पंचम काल में जिनेन्द्र भगवान का धर्म क्षीण होने से, आत्मा का ध्यान करने वाले मुनिजनों की विरलता होने से और गाढ़ मिथ्यात्वरूपी अन्धकार के फैल जाने से, जो जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा तथा जिन-मन्दिरों में भक्ति सहित थे, उनको भक्ति पूर्वक बनवाते थे - ऐसे मनुष्य, वर्तमान समय में देखने में नहीं आते हैं; फिर भी जो भव्य जीव, इस समय भी विधि के अनुसार जिन-मन्दिर आदि कार्यों को करते हैं, वे सज्जनों द्वारा वन्द्य हैं अर्थात् समस्त उत्तम पुरुष, निर्मल हृदय से उनकी स्तुति करते हैं ।