
बिम्बादलोन्नति-यवोन्नतिमेव भक्त्या;
ये कारयन्ति जिनसद्म-जिनाऽऽकृतिं च ।
पुण्यं तदीयमिह वागपि नैव शक्ता;
स्तोतुं परस्य किमु कारयितुर्द्वयस्य ॥22॥
(हरिगीत)
कुन्दु-पत्र समान लघु भी, जिनालय जो भवि करें ।
जौ समान जिनेन्द्र-प्रतिमा, भक्ति से उसमें धरें॥
उन्हें कितना पुण्य होगा? सरस्वती नहिं कह सके ।
करें दोनों कार्य जो, उनका कथन कैसे करें ?
अन्वयार्थ : जो भव्य जीव, इस संसार में भक्तिपूर्वक छोटे से छोटे बिम्बा पत्ते के समान जिन-मन्दिर तथा यव के समान जिन-प्रतिमा को भी बनाता है, उस मनुष्य को भी इतने पुण्य की प्राप्ति होती है कि जिसका साक्षात् सरस्वती भी वर्णन नहीं कर सकती, और की तो बात ही क्या? फिर जो मनुष्य, ऊँचे-ऊँचे जिन-मन्दिर तथा जिन-प्रतिमाओं को बनाने वाला है, उसको तो अगम्य पुण्य की ही प्राप्ति होती है ।