+ सिद्ध भगवान, तीन जगत के शिखामणि -
ये जित्वा निजकर्म-कर्कश-रिपून्, प्राप्ता: पदं शाश्वतं;
येषां जन्म-जरा-मृति-प्रभृतिभि:, सीमाऽपि नोल्लंघ्यते ।
येष्वैश्वर्यमचिन्त्यमेकमसम,-ज्ञानाऽऽदि-संयोजितं;
ते सन्तु त्रिजगच्छिखाग्रमणय:, सिद्धा मम श्रेयसे ॥4॥
कर्कश कर्म-शत्रु को जीता, शाश्वत शिवपद प्राप्त किया ।
जन्म-जरा-मरणादि दोष, जिनकी नहिं लाङ्घ सके सीमा॥
जो अनन्तज्ञानादि अचिन्त्य, ऐश्वर्य के स्वामी हैं ।
त्रिभुवन के हैं शिखामणि वे, सिद्ध प्रभु कल्याण करें॥
अन्वयार्थ : जो सिद्ध महाराज, अपने समस्त कठोर कर्मरूपी वैरियों को जीत कर, अविनाशी सिद्धपद को प्राप्त हुए हैं । जन्म-जरा-मरण आदि अठारह दोष जिनके पास फटकते भी नहीं हैं तथा जो अनन्त ज्ञानादि अचिन्त्य ऐश्वर्य के धारी हैं - ऐसे तीन जगत के शिखामणि सिद्ध भगवान, मेरा कल्याण करें, उन सिद्धों को मैं नमस्कार करता हूँ ।