
सिद्धो बोधमिति: स बोध उदितो, ज्ञेयप्रमाणो भवेत्;
ज्ञेयं लोकमलोकमेव च वदन्त्याऽऽत्मेति सर्वस्थित: ।
मूषायां मदनोज्झिते हि जठरे, यादृग् नभस्तादृश:;
प्राक्कायात्किमपि प्रहीण इति वा, सिद्ध: सदानन्दति ॥5॥
ज्ञान-प्रमाण सिद्ध भगवन् हैं, ज्ञेय-प्रमाण कहा वह ज्ञान ।
लोकालोक प्रमाण ज्ञेय है,अत: आत्मा त्रिभुवन-व्याप्त॥
साँचे में से मोम निकलने, पर ज्यों नभवत् पुरुषाकार ।
आनन्दित हैं सिद्ध चरम तन, से हैं किञ्चित् न्यूनाकार॥
अन्वयार्थ : निष्कलंक शुद्धात्मा सिद्ध भगवान, सर्वत्र ज्ञान-प्रमाण हैं; ज्ञान, ज्ञेय प्रमाण है; ज्ञेय, लोकालोक प्रमाण हैं - इस युक्ति से आत्मा सर्वत्र विद्यमान है अर्थात् व्यापक है । जिस प्रकार मनुष्याकार एक मोम की पुतली बना कर, उसके ऊपर मिट्टी का लेप चढ़ा कर, फिर उस पुतली को तपा कर, मोम निकल जाने के बाद, उस मूषा में पुरुषाकार आकाश रह जाता है; उसी प्रकार सिद्धावस्था के पूर्व शरीर से कुछ कम आत्म-प्रदेशों के आकार स्वरूप वह शुद्धात्मा है अर्थात् वह अव्यापक भी है । इसलिए व्यापकत्व-अव्यापकत्व - ऐसे दोनों धर्मों से संयुक्त सिद्ध परमेष्ठी सदा जयवन्त हैं ।