+ अष्ट कर्म से रहित तथा अष्ट गुण से अलंकृत सिद्ध भगवान -
दृग्बोधौ परमौ तदावृतिहते:, सौख्यं च मोहक्षयात्;
वीर्यं विघ्न-विघाततोऽप्रतिहतं, मूर्तिर्न नाम-क्षते: ।
आयुर्नाशवशान्न जन्म-मरणे, गोत्रे न गोत्रं विना;
सिद्धानां न च वेदनीयविरहाद्, दु:खं सुखं चाक्षजम् ॥6॥
तदावरण-क्षय से दृग-ज्ञान अनन्त मोह-क्षय से सुख है ।
अनन्त-वीर्य-क्षय अन्तराय से, है अमूर्त नाम-क्षय से॥
जन्म-मरण नहिं आयु-क्षय से, अगुरुलघु हैं गोत्र बिना ।
इन्द्रिय सुख-दु:ख नहीं सिद्ध के, वेदनीय की प्रकृतिबिना॥
अन्वयार्थ : ज्ञानावरण तथा दर्शनावरणकर्म के नाश हो जाने से तो सिद्धों को अनन्तज्ञान तथा अनन्तदर्शन प्राप्त हुए हैं । मोहनीयकर्म के सर्वथा क्षय हो जाने के कारण उनको अनन्तसुख की प्राप्ति हुई है । वीर्यान्तरायकर्म के नाश हो जाने के कारण उनको अनन्तवीर्य की प्राप्ति हुई है । नामकर्म के अभाव से अमूर्त होने से उनकी कोई मूर्ति नहीं है । आयुकर्म का नाश हो जाने के कारण न उनके जन्म है, न मरण है । गोत्रकर्म का नाश होने से उनका कोई गोत्र नहीं है तथा वेदनीयकर्म के नाश हो जाने के कारण सिद्धों के इन्द्रियजन्य सुख-दु:ख भी नहीं है ।